Last Letter
कल तुम्हारा दिया हुआ आखिरी खत मिला। ना जाने क्या ढूँढते हुए मैं कमरे के उस कोने में चला गया, जहाँ यूँ तो बरसों से झांकना नहीं हुआ था। यहाँ एक कोने में बहुत सलीके से मोड़ा हुआ एक कागज़ का टुकड़ा था, जिसमें अभी भी तुम्हारी खुशबू बरकरार थी। थोड़ी देर मैंने सोचा कि यह कागज़ यहाँ क्या कर रहा है। फिर याद आया, जब तुम गए थे तो मैंने तुम्हारी दी हुई सारी चीजें घर के अलग-अलग कोनों में छुपा दी थीं, इस उम्मीद से कि मैं फिर अब इन्हें कभी नहीं देखूँगा।
शायद यही वो चीजें हैं जो रोज़ रात को खुसर-पुसर करती हैं, इस इंतज़ार में कि किस दिन मैं इन्हें मुक्ति दे दूँ। परंतु मुक्ति तो मैं खुद को भी नहीं दे पाया हूँ, इसीलिए तो यह खत यहाँ छुपा हुआ था, वरना जल चुका होता। जला ही देना चाहिए था, पर जब भी जलाने का सोचा, तब माचिस की तीली से सिगरेट जलाना ज्यादा सुंदर लगा... और यह खत जलाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, इसीलिए इन्हें मैंने छुपा दिया था।
खत को देख कर लगता है कि यह तुम्हारा आखिरी खत था। आखिरी इसलिए बोल रहा हूँ क्योंकि यह खुला नहीं है, मैंने कभी इसे पढ़ा नहीं। तुम्हारे जाने का कारण आज भी मुझे नहीं पता। लगता है कि इस खत में वो बात लिखी हुई होगी, पर एक डर सा लगता है इसे खोलने में। यह खत मेरे लिए उस तोहफे की तरह है जो जब तक खुला ना हो, तो लगता है कि उसके अंदर वही चीज़ है जिसकी कल्पना मैंने रोज़ की थी। पर जब वह तोहफा खुलता है तो निराशा और खुशी साथ होती है, एक विरोधाभास—निराशा कि यह वो चीज़ नहीं है, और खुशी कि चलो यह "वो" नहीं है।
इस खत को हाथ में लिए मैं बहुत देर तक सोच रहा था कि कैसे मन की गहराइयों में छुपे ये निशान हमारी सुप्त प्रवृत्तियों (latent tendencies) को झकझोर कर जगाने के लिए एक ट्रिगर (trigger) की तरह काम करते हैं। और यह सच में एक बड़ी अजीब बात है कि आज इतने समय के बाद यह खत अचानक से क्यों मेरे सामने आ गया। जब यह इतने साल तक छुपा हुआ था तो आज क्यों? ऐसी क्या आफ़त आ गई इसे छुपते हुए कि यह बाहर निकल आया। आज भी इसे जलाने की हिम्मत मेरे अंदर नहीं है, और आज भी एक सिगरेट मेरी जेब में रखी हुई है। मैंने तुम्हारे सारे दिए हुए स्मृति चिह्न छुपा या मिटा दिए थे, हाँ मिटा ही दिए थे, ऐसा मैं खुद को समझाता आ रहा हूँ, और डरता भी हूँ कि कहीं ये छुपाई हुई चीजें किसी टोपी में कैद कबूतर की तरह बाहर ना आ जाएँ।
पर जब खत मिल ही गया है तो उसका उत्तर देना भी बनता है, चलो मैं इस बात की कल्पना ही कर लेता हूँ कि इसमें क्या लिखा होगा। पर अब तुम नहीं हो तो उत्तर किसको लिखा जाए? जब इतनी कल्पनाओं का जाला बुन ही लिया है, तो एक और ही सही, मैं तुम्हारे खत को ही तुम्हारा प्रतिबिंब मान कर उसी को जवाब लिख देता हूँ। यह भी एक बहुत सुंदर लेखन है जब आप जानते हो कि सामने पढ़ने वाला सिर्फ सुन रहा होगा, और बिना रोक-टोक के हमारी बात भी पूरी हो जाएगी। हालाँकि बात पूरी होने जैसी कोई चीज़ होती नहीं है, हर बात में कोई बात अधूरी रह ज़रूर जाती है।
आखिरी खत की आखिरी पंक्ति को आखिरी बार उसी ने पढ़ा होगा जिसने इसे लिखा है। क्योंकि अगर आज मैं इसे पढ़ भी लूँ, तो भी शायद आखिरी पंक्ति तक नहीं पहुँच पाऊँगा, क्योंकि उससे पहले ही माचिस जल जाएगी और सिगरेट जल जाएगी, और मेरी एक और खत जलाने की कोशिश नाकाम हो जाएगी।
NOTE
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